
सोचा तुमको कथा सुनाऊँ,भारत की यह व्यथा सुनाऊँ ,
दिल से उठी कयास है ,
दिल तक पहुंचे यही प्रयास है!
पी. डी. सी. में राशन हरदम ,
१ किलो कम ही पाता हूँ ,
मिड डे मील के नाम पर,
घुन लगा गेंहूँ खाता हूँ ,
प्रदूषण से त्रस्त शहरों में ,
मुह पर कपडा रख के जीता हूँ ,
खाता हूँ कंकड़ चावल में ,
दूध में रोज यूरिया पीता हूँ ,
रेलवे आरक्षण का मंजर देखें ,
जनता सेवक बैठे ऐ. सी. में ,
बाहर लम्बी लाएन में तर ,
जनता रुपी मवेशी हैं ,
पाठशाला में बच्चों को ,
नाम तक लिखने न आये क्यूँ ?
मृत्यु पंजीकरण में भी बाबु ,
आखिर घूश खाए क्यूँ ?
सुना है उसने मुंह खोला था ,
आज उसके घर पर ताले क्यूँ ?
वह गाँव का एक बेटा था ,
क्षेत्र के विकाश का वह तो ,
एक नया प्रणेता था ,
करता था बातें बदलाव की ,
नफरत थी उसको अलगाव से ,
जबसे, उसने भरा चुनाव का पर्चा,
उसकी जान को लाले क्यूँ ?
सोंचो तो सिरदर्दी है ,
न सोंचों तो खुदगर्जी है ,
मैंने जो कहना था कह डाला ,
आगे आप की मर्ज़ी है .
~विनयतोष मिश्र