हिन्दी जगत !!

***हिन्दी के विकाश हेतु इसके प्रयोग को बढ़ावा दें !!***हिन्दी गवारों की भाषा नहीं यह भारतीय अंग्रेजी भाषी ही सिद्ध कर सकतें हैं !!***

Monday, October 26, 2009

दोस्त कहते हैं वह बदल गया है !


हास्य वृतान्न्तों ने कटाक्ष का रूप ले लिया,

हास परिहास ने वाणिज्य परिचर्चा का,

पारितोषिक पुस्तकों को भी बेचने वाला

किताबें हर कीमत पर खरीदता है ,

सबका मजाक उडाने वाला

हर आह से क्यूँ डरता है !!


बाल भी कुछ शायद सफ़ेद से हुए हैं

विचार कुछ परिपक्व ,

समाज से अलग एक समाज के लिए

कुछ कर पाने की झक ,

खाली हाथ सपने खरीदने चला

मन फिर भी हारने से नहीं डरता है !!


दोस्त कहते हैं वह बदल गया है !


~विनयतोष मिश्र

Friday, October 02, 2009

आज हर धड़कन खाली है !



भीड़ में भी अकेलापन सा
एकाकी में वह बीते दिन ,
यह क्या माज़रा या रब
दिल मेरा तुझसे सवाली है


आज मैं सोचूँ हर कदम पर
रहमत
तेरी हर रहगुजर पर
पर उनका क्या
जो जेब से या पेट से खाली हैं !


दिल से उठती हूंक सी
उनको जिन्दा रखती भूख ही
जिनके पेट है खाली
शायद उनकी जिंदगी है तरनुम
जिंदगी उनकी कव्वाली है



शायद उनकी भूख मिटा
मिल सकती है कुछ दुआ
कुछ पेट भरें ,कुछ जिंदगी
सब मिल करें तेरी बंदगी !


~जिंदगी

Tuesday, June 09, 2009

आपकी मर्ज़ी


सोचा तुमको कथा सुनाऊँ,
भारत की यह व्यथा सुनाऊँ ,
दिल से उठी कयास है ,
दिल तक पहुंचे यही प्रयास है!

पी. डी. सी. में राशन हरदम ,
१ किलो कम ही पाता हूँ ,
मिड डे मील के नाम पर,
घुन लगा गेंहूँ खाता हूँ ,

प्रदूषण से त्रस्त शहरों में ,
मुह पर कपडा रख के जीता हूँ ,
खाता हूँ कंकड़ चावल में ,
दूध में रोज यूरिया पीता हूँ ,

रेलवे आरक्षण का मंजर देखें ,
जनता सेवक बैठे ऐ. सी. में ,
बाहर लम्बी लाएन में तर ,
जनता रुपी मवेशी हैं ,

पाठशाला में बच्चों को ,
नाम तक लिखने न आये क्यूँ ?
मृत्यु पंजीकरण में भी बाबु ,
आखिर घूश खाए क्यूँ ?

सुना है उसने मुंह खोला था ,
आज उसके घर पर ताले क्यूँ ?
वह गाँव का एक बेटा था ,
क्षेत्र के विकाश का वह तो ,
एक नया प्रणेता था ,
करता था बातें बदलाव की ,
नफरत थी उसको अलगाव से ,

जबसे, उसने भरा चुनाव का पर्चा,
उसकी जान को लाले क्यूँ ?

सोंचो तो सिरदर्दी है ,
न सोंचों तो खुदगर्जी है ,
मैंने जो कहना था कह डाला ,
आगे आप की मर्ज़ी है .

~विनयतोष मिश्र

Saturday, May 30, 2009

भोलापन देख के डर लगता है!!


तेरा भोलापन देख के डर लगता है,
तेरी उलझन देख के डर लगता है,
नुमाइश के इस दौर में अब तो,
तेरा चिलमन देख के डर लगता है!

तू होना चाहे सबकी प्रिया,
बेगैरतों को भी प्यार दिया,
तेरे इस बेमेल चलन से डर लगता है,
तेरे इस अपनापन से डर लगता है!

मैं तुझसा नहीं, मैं पाक नहीं,
मैं भीड़ में हूँ तू रहनुमा ,
सोचा तुझसे कुछ कहने को,
पर अपने दीवानेपन से डर लगता है.

~विनयतोष मिश्र

Wednesday, May 27, 2009

कोई दीवाना कहता है!!



कोई दीवाना कहता है,
कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को
बस बादल समझता है


मैं तुझसे दूर कैसा हूँ ,
तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है ,
या मेरा दिल समझता है

मुहब्बत एक एहसासों की
पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था
कभी मीरा दीवानी है

यहाँ सब लोग कहते हैं
मेरी आँखों में आँसू हैं
जो तू समझे तो मोती है,
जो न समझे तो पानी है

समंदर पीर का अन्दर है
लेकिन रो नहीं सकता
यह आँसू प्यार का मोती है
इसको खो नहीं सकता

मेरी चाहत को अपना
तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया
वो तेरा हो नहीं सकता

की ब्रह्मार कोई कुमुदनी पर
मचल बैठा तो हंगामा
हमारे दिल में कोई ख्वाब
पल बैठा तो हंगामा
अभी तक डूब कर सुनते थे
सब किस्सा मुहब्बत का
मैं किस्से को हकीकत में
बदल बैठा तो हंगामा

~कुमार विश्वाश

Tuesday, May 26, 2009

आँखें मेरी मुझसे खफा हैं ..

कभी खुली आँख से सपने देखे
इन्द्रध्नुस से रंग लिए
सपने में वह अपने लगे
मेरे सपनो के वह संग खिले

आज वह आँखें रोती हैं
थकती है न सोती है
पल पल पंथ निहारे उनकी
खबर न आने की है जिनकी

दिल ने दिया है उसको धोखा
दिमाग ने था तो तुझे रोका
क्यों आँखें तुने चार किया
न करते करते प्यार किया

अब क्या राह निहारे है
बिन चोट के क्यूँ कराहे है
बावलों की तो यही सजा है
सुन मेरी बात यह शायद ..

आँखें मेरी मुझसे खफा हैं ..
~विनयतोष मिश्र

उलझन


कित्नु से परन्तु तक भटकता ,
सोच में डूबा अहेंकार में उलझता
मुश्किलों से जूझता सपनो में डूबता
सच की तलाश झूठ में ढूंढता
अहम में अपनत्व को खोजता

शुशील लिबास में अश्लीलता को घूरता
निर्दोष नेत्रों से पाप को देखता
पलायित अश्रु से सच्चाई को झुठलाता
रोता चीखता चिल्लाता हुआ
वो तुम्हारी और मेरी अंतरात्मा का आदमी
कोरी नयी दुनिया को कल्पित करता हुआ
कभी जीता और जीके मरता हुआ
सद्कर्म का जामा कुत्नित्यों को पहनता हुआ

मैंने भी देखा उसे अपने अंदर सांस लेते ,
हुंकार भरते अपने भीतर आज खडा
मैं उलझन पे पड़ा कब तक ये जियेगा
और सच्चाई का खून पिएगा
कब तक ये जियेगा

~परितोष

Monday, May 25, 2009

इक दोस्त का उपला और गया!



यह कविता मुझे छू गयी क्योंकि बचपन में मैंने भी उपले थापे हैं .अपने प्रिय कवि गुलज़ार की कविता अपने गाँव की स्मृतियों को सजोये हुए. ~विनयतोष मिश्र


छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
आँख लगाकर - कान बनाकर
नाक सजाकर -
पगड़ी वाला, टोपी वाला
मेरा उपला -
तेरा उपला -
अपने-अपने जाने-पहचाने नामों से
उपले थापा करते थे

हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर
गोबर के उपलों पे खेला करता था
रात को आँगन में जब चूल्हा जलता था
हम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थे
किस उपले की बारी आयी
किसका उपला राख हुआ
वो पंडित था -
इक मुन्ना था -
इक दशरथ था -
बरसों बाद - मैं
श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ
आज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे में
इक दोस्त का उपला और गया!

~गुलज़ार