हिन्दी जगत !!

***हिन्दी के विकाश हेतु इसके प्रयोग को बढ़ावा दें !!***हिन्दी गवारों की भाषा नहीं यह भारतीय अंग्रेजी भाषी ही सिद्ध कर सकतें हैं !!***

Friday, March 09, 2012

सन्देश लाया है फगुआ !

फागुन आया आयी होली ,
धूलि के रंग में वैमन्य्स्ता धूली|
पिचकारी ,रंग और गुलाल ,
मिटने को हैं हर रंज मलाल ||

काशी से शिव ,राम अवध से ,
मथुरा से कान्हा का आशीष |
मन को रंग लो भक्ति भाव से ,
जीवन से पलायित हो विष ||

गुरुचरणों में अर्पित कर गुलाल ,
वर्ष का आरम्भ करें हम आज |
खुशियाँ बने आपकी अगुआ ,
यह सन्देश लाया है फगुआ ||

-विनयतोष मिश्र

Monday, January 02, 2012

नव वर्ष मंगलमय हो!


नव वर्ष मंगलमय हो ,
खुशियों में मंगल ज्यादा ,
और मय कम हो !


कुछ मासूम खवाहिशें !


पानी साफ़ आयें नलका ,
डॉलर कुछ पड़ जाये हल्का ,
नेता न निकले फिर चीन्दी ,
वार न करे फिर से मंदी!


महंगाई न बजाये बारह !
तभी होगा मंगलमय ...
दो हज़ार बारह !


-विनयतोष मिश्र

Thursday, December 08, 2011

मरना तो सबको है एक दिन है ,
किसी बदनाम पर चलो यह इल्ज़ाम जाये !

तेरी आँखें रहे पाक दामन ,
हम काफ़िर , ग़लत यह ज़ाम कहलाये !  

~विनयतोष मिश्र 

Sunday, June 05, 2011

फिर लाठी चली लोकतंत्र में

फिर लाठी चली लोकतंत्र में ,
और मुद्दा लोकहित का था !

निजी हित से लिप्त देश में ;
सर्वहित की कोई बात नहीं ,
सर्वजन के मुद्दे पर ;
लहू उबलता आज नहीं !

खूंन उबलेगा कैसे जब ;
घर ऑफिस में ए सी है,
वह मुद्दा स्तर से नीचे ;
जो मुद्दा खालिश देशी है !

लाठी चलती रहेगी लोकतंत्र में,
और मुद्दा लोकहित का होगा !

~विनयतोष मिश्र

भाग , Bose.DK!

बाबा , बेबस ,बल्ला ,भ्रस्ताचार और बलात्कार ,
नए दौर के भारत का करो साक्षात्कार !
बचे तो बचे .टिके तो टिके ..
नहीं तो कहना भाग , Bose.DK!

~विनयतोष मिश्र

Monday, May 16, 2011

वह दिन भी आएगा !

लगेगी होड़ गरीबों में मरने की ,
कफ़न कल कहीं महंगा न हो जाये !

करेंगें चोर पहरेदारी जनता की ,
डर है नेता लहंगा तक न ले जाये !

-विनयतोष मिश्र

Thursday, April 21, 2011

कुछ बातें एंवी !

घर खिड़कियों और दीवारों से नहीं बनते.

परदे भी बदरंग हो जाते हैं धुलते धुलते ,

चलो एक आशियाँ बनाये ख्वाबों की दुनिया में ..

और अर्स तक जाएँ पलकों पर चलते चलते !


मोती से खेलने वाले, जज्बातों से खेलते हो,

मोती बिखर न जाएँ कहीं ,तेरी राहों को धोते धोते !


सफ़ेद टोपी के नीचे भारी कालिख़ ,

जमीं थक गयी है अब ,सालों से ढ़ोते ढ़ोते !


इन्सान की खुदगर्जी या अल्लाह तेरी मर्ज़ी,

वह रो रही है, अपनी औलाद के होते होते !


-विनयतोष मिश्र

Saturday, April 09, 2011

देश पुकारे अन्ना हजारे !

जीत गए अन्ना, जीत गया देश ,

जीत गए शांतिभूषण, जीते अग्निवेश !


आगे आये ,आमिर ,शबाना,अनुपम खेर ,

भूख से हो गए ,६५ असली शेर ढेर !


कुछ बैठे रहे घर, और किया टर टर ,

सुना उन्हें भी, माध्य हुआ फेसबुक -ट्विटर !


इस जीत से एक हुआ तो है, सकारात्मक असर ,

सरकार को हो गया है ,अब जनता का डर!


अब सोना नहीं ,क्योंकि हमें इन्हें जगाना है ,

रास्ता कठिन है, और बहुत दूर जाना है !


~विनयतोष मिश्र


वक्त आ गया है की उन्हें चोर कहें !


कब तक हम उन्हें कमजोर कहते रहेंगें ..

वक्त आ गया है की उन्हें चोर कहें !


अब तक पुरवाइयों से हिलाते रहे जिनको ..

वक्त आ गया की सुनामियों सा जोर करें !


खाना छोड़ने से , खाना क्या छोड़ देंगे यह,

वक्त आ गया है की हलक से निवाला छोर लें !


अभी तक जूता चप्पल आपस में फेकते यह ,

उन जूतों की ज़लालत से इन्हें शराबोर करें !


~विनयतोष मिश्र


तरीका नरम हो या गरम हो , कुछ ऐसा करो की इन्हें शर्म हो ...